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VOL. 8, ISSUE 1 (2026)
श्रीमद् भगवद्गीता एवं सामाजिक सद्भावना एक विश्लेषण
Authors
डॉ. कल्पना सिंह
Abstract
श्रीमद्भागवद्गीता एक महान धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथ है जो मानव जीवन के लिए मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है। इसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मए धर्म और भक्ति के सिद्धांतों से परिचित करायाए जो न केवल व्यक्तिगत जीवन के लिएए बल्कि समाज में शांति और सद्भावना को बढ़ावा देने के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। गीता के अनुसारए निष्काम कर्म; स्वार्थहीन कार्य ही सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि यह व्यक्ति को अपने कर्तव्यों में लीन कर समाज की भलाई के लिए काम करने की प्रेरणा देता है। इसके अलावा गीता में आत्मज्ञान की प्राप्ति और आत्मा के अमरत्व का भी उल्लेख किया गया हैए जो सामाजिक भेदभाव और जातिवाद को समाप्त करने में मदद कर सकता है। आज के आधुनिक समाज में जहाँ भेदभावए असहिष्णुताए और सामाजिक तनाव बढ़ रहे हैंए गीता की शिक्षाएँ अत्यंत प्रासंगिक हैं। इसके द्वारा सिखाए गए सिद्धांतए जैसे कि निष्काम कर्म, आत्म.साक्षात्कारए और सार्वभौमिक मानवताए समाज में एकताए समानता और सहिष्णुता की भावना को बढ़ावा दे सकते हैं। गीता का यह संदेश स्पष्ट है कि सत्य और धर्म की ही स्थायी विजय होती हैए और यही समाज में शांति और समरसता की कुंजी है। इस अध्ययन में गीता की शिक्षाओं का सामाजिक संदर्भ में विश्लेषण किया गया है और यह दर्शाया गया है कि ये शिक्षाएँ आधुनिक समाज में शांति और सद्भावना को बढ़ाने में कैसे योगदान कर सकती हैं।
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Pages:37-41
How to cite this article:
डॉ. कल्पना सिंह "श्रीमद् भगवद्गीता एवं सामाजिक सद्भावना एक विश्लेषण". International Journal of Social Research and Development, Vol 8, Issue 1, 2026, Pages 37-41
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